बशीर बद्र का निधन: ‘बस्तियां जलाने’ पर रोने वाला मसीहा शांत; आखिरी दिनों में खुद के ही शेर भूल चुका था ये महान शायर!

भोपाल, 28 मई 2026 — उर्दू अदब के मशहूर शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र का निधन हो गया। 91 वर्ष की उम्र में भोपाल में उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन के बाद साहित्य जगत और सोशल मीडिया पर शोक की लहर दौड़ गई, और लोग उनकी अमर ग़ज़लें साझा कर उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं।

जिसे दुनिया गुनगुनाती थी, वह ख़ुद भूल चुके थे

बशीर बद्र के जीवन का सबसे मार्मिक पहलू यह रहा कि अपने आख़िरी वर्षों में वे डिमेंशिया से जूझ रहे थे — याददाश्त धीरे-धीरे साथ छोड़ती गई। मोहब्बत और यादों पर 18,000 से अधिक शेर लिखने वाले शायर आख़िरी दिनों में अपनी ही पंक्तियां भूल चुके थे। उनका यह मशहूर शेर आज हर ज़ुबान पर है:

“लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।”

सादगी और सम्मान

15 फ़रवरी 1935 को जन्मे बशीर बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में उर्दू पढ़ाया। वर्ष 1999 में भारत सरकार ने उन्हें साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया, और इसी वर्ष उनके संग्रह ‘आस’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। बताया जाता है कि 1987 की मेरठ हिंसा में उनका घर और बेशक़ीमती पांडुलिपियां नष्ट हो गई थीं, जिसके बाद वे भोपाल आकर बस गए।

एक युग का अंत

बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी ख़ासियत उसकी सरल, आम बोलचाल की भाषा थी — यही वजह है कि नेताओं से लेकर आम पाठकों तक हर कोई उनका दीवाना था। भले ही डिमेंशिया ने उनकी अपनी यादें छीन लीं, लेकिन उनके शेर हर धड़कते दिल में हमेशा ज़िंदा रहेंगे।

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