जयपुर: 21वीं सदी की बदलती भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के बीच, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार की मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है। संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरीश पर्वतनेनी ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी है कि यदि सुरक्षा परिषद के सुधारों में स्थायी सदस्यता का विस्तार नहीं किया जाता है, तो यह वैश्विक संस्था के लिए एक “विफलता” के समान होगा। क्या अब समय आ गया है कि भारत को वह स्थान मिले जिसका वह लंबे समय से हकदार है?
UNSC सुधार पर भारत का सख्त रुख
भारत ने हमेशा यह तर्क दिया है कि 1945 में स्थापित 15-सदस्यीय सुरक्षा परिषद आज की दुनिया का प्रतिनिधित्व नहीं करती है। वैश्विक दक्षिण (Global South) के देशों की आवाज को नजरअंदाज करना अब अंतरराष्ट्रीय स्थिरता के लिए खतरा बनता जा रहा है। भारत का मानना है कि केवल अस्थायी श्रेणी का विस्तार करने से निर्णय लेने की शक्ति का ढांचा नहीं बदलेगा।
भारत के दावे को मजबूत करने वाले प्रमुख कारक
(UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को वैश्विक स्तर पर भारी समर्थन मिल रहा है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं:

- जनसांख्यिकीय शक्ति: दुनिया की सबसे बड़ी लोकतंत्र के रूप में भारत वैश्विक आबादी के छठे हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।
- आर्थिक महाशक्ति: भारत की जीडीपी (PPP) 2026 में 20 ट्रिलियन डॉलर के करीब होने का अनुमान है। भारत वैश्विक व्यापार, ऊर्जा बाजारों और विकास वित्त में एक प्रमुख स्तंभ बन चुका है।
- शांति स्थापना में योगदान: 1948 से संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन में भारत का योगदान किसी भी अन्य देश की तुलना में अग्रणी रहा है।
- वैश्विक समर्थन: हाल ही में सेशेल्स के विदेश मंत्री ने भी भारत को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट देने का जोरदार समर्थन किया है। अमेरिका समेत कई अन्य प्रमुख वैश्विक शक्तियाँ भी भारत की दावेदारी को तर्कसंगत मानती हैं।
चुनौतियां और कूटनीतिक संघर्ष
हालांकि भारत की दावेदारी प्रबल है, लेकिन राह आसान नहीं है। सुरक्षा परिषद के चार्टर में संशोधन के लिए स्थायी सदस्यों के साथ-साथ दो-तिहाई देशों की स्वीकृति आवश्यक है। चीन जैसे देश इस प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करते रहे हैं। इसके अलावा, कुछ देश ‘जी-4’ (भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील) की बढ़ती ताकत को संतुलित करने के लिए अपनी अलग रणनीतियां अपना रहे हैं।
भारत का भविष्य और सुरक्षा परिषद
सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता न केवल भारत की उभरती ‘सुपर पावर’ छवि को बढ़ावा देगी, बल्कि यह एशिया और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए भी अनिवार्य है। जैसा कि भारतीय राजनयिकों ने दोहराया है, यदि संयुक्त राष्ट्र खुद को समकालीन वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं बदलता, तो इसकी प्रासंगिकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
भारत की यह मांग अब केवल एक क्षेत्रीय आकांक्षा नहीं, बल्कि एक वैश्विक आवश्यकता है। आने वाले दिनों में देखना दिलचस्प होगा कि क्या संयुक्त राष्ट्र वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव के लिए तैयार है या नहीं।
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