विशेषज्ञों की चेतावनी: हिमाचल में प्राकृतिक आपदाओं से ₹46,000 करोड़ का नुकसान, नीतियों में बदलाव की मांग

जयपुर/शिमला:
एक नई पर्यावरण रिपोर्ट के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक आपदाएं और बदलता मौसम राज्य की अर्थव्यवस्था और जनजीवन पर भारी असर डाल रहे हैं। पिछले चार वर्षों में विभिन्न सरकारी विभागों के अनुमान के मुताबिक, राज्य को प्राकृतिक आपदाओं के कारण लगभग ₹46,000 करोड़ का भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है।

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद पर्यावरण वैज्ञानिकों और नीति विशेषज्ञों ने सरकार से अपनी विकास नीतियों में तुरंत बदलाव करने की मांग की है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो नाजुक हिमालयी क्षेत्र में यह तबाही और बढ़ सकती है।

प्राकृतिक आपदाओं से तबाही के प्रमुख आंकड़े:

जान-माल का नुकसान: रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले पांच मानसून सीजन में हिमाचल प्रदेश में लगभग 1,700 लोगों ने अपनी जान गंवाई है। इसके अलावा हजारों घर, सड़कें और बुनियादी ढांचे पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं।

बढ़ता तापमान: साल 1901 के बाद से राज्य के औसत तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे मौसम का चक्र पूरी तरह से बदल गया है।

तेजी से पिघलते ग्लेशियर: राज्य में ग्लेशियर अब 50 मीटर प्रति वर्ष से अधिक की गति से पीछे खिसक रहे हैं। इससे नई अनियंत्रित झीलें बन रही हैं, जिससे ग्लेशियर फटने (GLOF) और अचानक बाढ़ आने का खतरा काफी बढ़ गया है।

जल संकट: पहाड़ों में पानी के स्रोत तेजी से प्रभावित हो रहे हैं। राज्य के लगभग दो-तिहाई पारंपरिक चश्मे (पानी के स्रोत) सूख चुके हैं, जिसके कारण कई गांवों के लोगों को पलायन करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

खेती और बागवानी पर संकट: बागवानी वैज्ञानिकों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन का यह असर हिमाचल के प्रमुख सेब उद्योग पर भी पड़ रहा है। सर्दियों के छोटे होने और बर्फबारी कम होने से सेब की फसल के लिए जरूरी ‘चिलिंग आवर्स’ (ठंड के घंटे) पूरे नहीं हो पा रहे हैं। इसके साथ ही बढ़ते तापमान के कारण फसलों में कीड़ों और बीमारियों का प्रकोप भी बढ़ गया है, जिससे उत्पादकता घट रही है।

विशेषज्ञों ने क्या दिए सुझाव?


रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने साफ किया है कि हिमाचल ने स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबी उन्मूलन में बेहतरीन काम किया है, लेकिन जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संकट इस विकास को पीछे धकेल रही हैं।

विशेषज्ञों ने सरकार से मांग की है कि:

  • पहाड़ी क्षेत्रों में अंधाधुंध और अवैज्ञानिक निर्माण कार्यों पर रोक लगाई जाए।
  • बुनियादी ढांचे के विकास में ‘क्लाइमेट-रेजिलिएंट’ (जलवायु अनुकूल) तकनीकों को शामिल किया जाए।
  • राज्य के पर्यावरण और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए नई और सख्त नीतियां बनाई जाएं।